ग्‍यारहवीं पुतली त्रिलोचना की कहानी भााग - 12



राजा भोज हर दिन तैयार होकर सिंहासन पर बैठने के लिए राज दरबार पहुंचते रहे और हर दिन दिव्‍य सिंहासन की सुंदर पुतलियां जाग्रत हेाकर उन्‍हें टोकती रही। हर पुतली उन्‍हें राजा विक्रमादित्‍य के त्‍याग और शौर्य की अतुलनीय गाथा सुनाकर सिंहासन पर बैठने से रोक देती। अब तक आप 10 पुतलियों द्वारा सुनाई कथा पढ चुके हैं। आए आज पढते हैं ग्‍यारहवीं पुतली त्रिलोचना की सुनाई कहानी-
अगले दिन राजा भोज जब दरबार में पहुंचे तो ग्‍यारहवीं पुतली त्रिलोचना जैसे जाग्रत होने के लिए तैयार ही बैठी थी। त्रिलोचना बोली, हे राजा भोज, आप प्रतिदिन इस सिंहासन पर बैठने के लिए आते हैं और राजा विक्रमादित्‍य की कथा सुनने के बाद लौट जाते हैं। फिर भी आपने अब तक हिम्‍मत नहीं हारी?

राजा भोज का अभिमान अब कम हो चला था। वे विनम्रतापूर्वक बोले, हे सुंदरी, आप हमें राजा विक्रमादित्‍य की कौन सी कथा सुनाने वाली हैं कृपया सुनाएं। हमारे साथ्‍-साथ नगर की प्रजा भी अपने पूर्व राजा की वीरता और त्‍याग से परिचित होना चाहती हैं।



त्रिलोचना ने मुस्‍कुरा कर कथा आरंभ की हे राजन् राजा विक्रमादित्‍य बहुत बङे प्रजापालक थे। उन्‍हें हमेशा अपनी प्रजा की सुख-समृद्धि की ही चिंता सताती रहती थी। एक बार उन्‍होंने एक महायज्ञ करने की ठानी। असंख्‍य राजा-महाराजाओं, पडितों और ॠषियों को आमन्त्रित किया। यहां तक कि देवताओं को भी उन्‍होंने नहीं छोङा।

पवन देवता को उन्‍होंने खुद निमंत्रण देने का मन बनाया तथा समुद्र देवता को आमन्त्रित करने का काम एक योग्‍य ब्राह्मण को सौंपा। दोनों अपने काम से विदा हुए। जब विक्रम वन में पहुंचे तो उन्‍होंने धयान करना शुरू किया ताकि पवन देव का पता-ठिकाना ज्ञात हो। योग-साधना से पता चला कि पवन देव आजकल सुमेरू पर्वत पर वास करते हैं।

उन्‍होंने सोचा अगर सुमेरू पर्वत पर पवन देवता का आहृान किया जाए तो उनके दर्शन हो सकते हैं। उन्‍होंने दोनों बेतालों का स्‍मरण किया तो वे उपस्थित हो गए। उन्‍होंने उन्‍हें अपना उद्देश्‍य बताया। बेतालों ने उन्‍हें आनन-फानन में सुमेरू पर्वत की चोटी पर पहुंचा दिया। चोटी पर इतना तेज हवा थी कि पैर जमाना मुश्किल था। बङे-बङे वृक्ष और चट्टान अपनी जगह से उङकर दूर चले जा रहे थे। मगर विक्रम तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे योग-साधना में सिद्धहस्‍त थे, इसलिए एक जगह अचल होकर बैठ गए। बाहरी दुनिया को भूलकर पवन देव की साधना में रत हो गए। न कुछ खाना, न पीना, सोना और आराम करना भूलकर साधना में लीन रहे।

आखिरकार पवन देव ने सुधि ली। हवा का बहना बिल्‍कुल थम गया। मन्‍द-मन्‍द बहती हुई वायु शरीर की सारी थकान मिटाने लगी। आकाशवाणी हुई- ‘हे राजा विक्रमादित्‍य, तुम्‍हारी साधना से हम प्रसन्‍न हुए। अपनी इच्‍छा बताएं।’

विक्रम अगले ही क्षण सामान्‍य अवस्‍था में आ गए और हाथ जोङकर बोले कि वे अपने द्वारा किए जा रहे महायज्ञ में पवन देव की उपस्थिति चाहते हैं। पवन देव के पधारने से उनके यज्ञ की शोभा बढे्गी। यह बात विक्रम ने इतना भावुक होकर कही कि पवन देव हंस पङे।

उन्‍होंने जवाब दिया कि सशरीर यज्ञ में उनकी उपस्थिति असंभव है। वे अगर सशरीर गए, तो विक्रम के राज्‍य में भयंकर आंधी-तूफान आ जाएगा। सारे लहलहाते खेत, पेङ-पौधे, महल और झोपङियां-सब की सब उज्‍ङ जाएंगी। रही उनकी उपस्थिति की बात, तो संसार के हर कोने में उनका वास है, इसलिए वे अप्रत्‍यक्ष रूप से उस महायज्ञ में भी उपस्थित रहेंगे। विक्रम उनका अभिप्राय समझकर चुप हो गए।

पवन देव ने उन्‍हें आर्शिवाद देते हुएकहा कि उनके राज्‍य में कभी अनावृष्टि नहीं होगी और कभी दुर्भिक्ष्‍ का सामना उनकी प्रजा को नहीं करना पङेगा।

उन्‍होंने विक्रम केा कामधेनु गाय देते हुए कहा कि इसकी कृपा से कभी भी विक्रम के राज्‍य में दूध की कमी नहीं होगी। जब पवनदेव लुप्‍त हो गए, तो विक्रमादित्‍य ने दोनों बेतालों का स्‍मरण किया और बेताल उन्‍हें लेकर उनके राज्‍य की सीमा तक आए।

जिस ब्राह्मण को विक्रम ने समुद्र देवता को आमन्त्रित करने का भार सौंपा था, वह काफी कठिनाइयों को झेलता हुआ सागर तट पर पहुंचा। उसने कमर तक सागर में घुसकर समुद्र देवता का आहृान किया।

उसने बार-बार दोहराया कि महाराजा विक्रमादित्‍य महायज्ञ कर रहे हैं और वह उनका दूत बनकर उन्‍हें आमंत्रित करने आया है। अंत में समुेद्र देवता असीम गहराई से निकलकर उसके सामने प्रकट हुए। उन्‍होंने ब्राह्मण से कहा कि उन्‍हें उस महायज्ञ के बारे में पवन देवता ने सब कुछ बता दिया है। वे पवन देव की तरह ही विक्रमादित्‍य के आमन्‍त्रण का स्‍वागत तो करते हैं, लेकिन सशरीर वहां सम्मिलित नहीं हो सकते हैं।

ब्राह्मण ने समुद्र देवता से अपना आशय स्‍पष्‍ट करने का सादर निवेदन किया, तो वे बोले कि अगर वे यज्ञ में सम्मिलित होने गए तो उनके साथ अथाह जल भी जाएगा और उसके रास्‍ते में पङने वाली हर चीज डूब जाएगी। चारों और प्रलय-सी स्थिति पैदा हो जाएगी। सब कुछ नष्‍ट हो जाएगा।
जब ब्राह्मण ने जानना चाहा कि उसके लिए उनका क्‍या आदेश हैं, जो समुद्र देवता बोले कि वे विक्रम को सकुशल महायज्ञ सम्‍पन्‍न कराने के लिए शुभकामनाएं देते है अप्रत्‍यक्ष रूप में यज्ञ में आद्योपति विक्रम उन्‍हें महसूस करेंगे, क्‍योंकि जल की एक-एक बून्‍द मे ंउनका वास है। यज्ञ में जा ेजल प्रयुक्‍त होगा उसमें भी वे उपस्थित रहेंगे।

उसके बाद उन्‍होंने ब्राह्मण को पांच रत्‍न और एक घोङा देते हुए कहा- ‘मेरी और से एक घोङा देते हुए कहा- ‘मेरी और से राजा विक्रमादित्‍य को यह उपहार दे देना।’ ब्राह्मण घोङा और रत्‍न लेकर वापस चल पङा। उसको पैदल चलता देख वह घोङा मनुष्‍य की बोली में उससे बोला कि इस लंबे सफर के लिए वह उसकी पीठ पर सवार क्‍यों नहीं हो जाता। उसके ना-नुकुर करने पर घोङे ने उसे समझाया कि वह राजा का दूत है, इसलिए उसके उपहार का उपयोग वह कर सकता है। ब्राह्मण जब राजी होकर बैठ गया तो वह घोङा पवन वेग से उसे विक्रम के दरबार ले आया।

घोङे की सवारी के दौरान उसके मन में इच्‍छा जगी-‘काश! यह घोङा मेरा होता!’

जब विक्रम को उसने समुद्र देवता से अपनी बातचीत सविस्‍तार बताई और उन्‍हें उनके दिए हुए उपहार दिए। तब बिना कुछ कहे ही राजा विक्रमादित्‍य ने कहा कि पांचों रत्‍न तथा घोङा ब्राह्मण को ही प्राप्‍त होने चाहिए, चूंकि रास्‍ते में आनेवाली सारी कठिनाइयां उसने राजा की खातिर हंसकर झेलीं।

उनकी बात समुद्र देवता तक पहुंचाने के लिए उसने कठिन साधना की। ब्राह्मण रत्‍न्‍ और घोङा पाकर अति प्रसन्‍न हुआ।

इतना कहकर त्रिलोचना बोली, राजन् विक्रमादित्‍य की तरह प्रजापालक और अत्‍यंत दयालु राजा ना हुआ है और न होगा। अगर इस सिंहासन पर बैठने की लालसा है तो आपको भी उनके गुणों को आत्‍मसात करना होगा। त्रिलोचना पुन: पुतली रूप में सिंहासन पर स्‍थापित हो गई।

अगले दिन बारहवीं पुतली पद्मावती ने रोका राजा भोज का रास्‍ता सुनाई गाथा। 
ग्‍यारहवीं पुतली त्रिलोचना की कहानी भााग - 12 ग्‍यारहवीं पुतली त्रिलोचना की कहानी  भााग - 12 Reviewed by Kahaniduniya.com on अक्तूबर 30, 2019 Rating: 5

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